क्रोध, मान, माया और लोभ त्यागने का दिया संदेश, साध्वी रत्ननिधि श्रीजी का प्रवचन | @NeemuchToday

नीमच टुडे न्यूज़ | नीमच चातुर्मासिक आराधना के अंतर्गत आयोजित प्रवचन में साध्वी रत्ननिधि श्रीजी ने तत्त्वार्थ सूत्र के प्रथम अध्याय का विवेचन करते हुए कहा कि आत्मा को संसार में बांधने वाले चार प्रमुख कषाय—क्रोध, मान, माया और लोभ—आध्यात्मिक उन्नति में सबसे बड़ी बाधा हैं। उन्होंने बताया कि इन चारों कषायों के अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन जैसे चार-चार भेद हैं, जिनकी तीव्रता के अनुसार आत्मा की शुद्धि प्रभावित होती है। साध्वीश्री ने सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि जैसे-जैसे कषायों की तीव्रता कम होती है, वैसे-वैसे आत्मा निर्मलता की ओर अग्रसर होती जाती है। प्रवचन में उन्होंने कहा कि श्री नवकार महामंत्र चौदह पूर्वों का सार है और यह किसी व्यक्ति विशेष का नहीं, बल्कि पंच परमेष्ठी के गुणों का वंदन है।

श्रद्धा और समर्पण के साथ किया गया नवकार महामंत्र का जाप आत्मबल, निर्भयता और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। इस दौरान उन्होंने एक प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि नवकार महामंत्र की महिमा से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं और संकट की घड़ी में साधक की रक्षा होती है। अंत में उन्होंने कहा कि चातुर्मास आत्मचिंतन, आत्मसंयम और आत्मशुद्धि का महापर्व है। यदि व्यक्ति क्रोध के स्थान पर क्षमा, मान के स्थान पर विनय, माया के स्थान पर सरलता तथा लोभ के स्थान पर संतोष को अपनाकर नवकार महामंत्र को जीवन का आधार बना ले, तो आत्मकल्याण का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है।

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